Thursday, November 19, 2015

'सबका साथ, सबका विकास' पर मज़बूती से अमल करें मोदी

(14 नवंबर 2015)
मेरा ख्याल है कि वेम्बले में मोदी ने उठ रहे सवालों के संतोषजनक जवाब दिए हैं। जो लोग TV स्क्रीन और अख़बारों की हेडलाइंस से भारत को समझने की कोशिश करेंगे, वे भारी गलती करेंगे। मीडिया की स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन उसे ज़िम्मेदार बनाने के लिए कुछ किये जाने की ज़रुरत है। खासकर दो सम्प्रदायों और जातियों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में।
बहरहाल, मोदी विदेशों में बोलते हैं तो विश्वनेता लगते हैं, लेकिन बिहार में रैली करते हैं, तो उन्हें संकीर्ण सोच वाले स्थानीय नेताओं के स्तर तक गिरना पड़ता है। बिहार चुनाव में वे भारी भूल कर चुके हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि ऐसी गलती वे दोबारा नहीं करेंगे। पार्टी में सामूहिक नेतृत्व को बढ़ावा देंगे और अपना ध्यान पूरी तरह से सरकार के काम और उन वादों को पूरा करने में लगाएंगे, जो उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले किये और अब भी जगह-जगह करते हैं।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मोदी-विरोध में कब राष्ट्र-विरोध की लाइन पार कर जाते हैं, इसका उन्हें एहसास तक नहीं है। सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान में जाकर भारत की पाक नीति की आलोचना की और नवाज़ शरीफ के लिए कसीदे पढ़े। कथित असहिष्णुता के मुद्दे का हौवा खड़ा करके भी विपक्ष ने देश को शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ये लोग पार्लियामेंट में भी सरकार को काम करने से रोकना चाहेंगे। इसलिए मोदी के सामने चुनौतियाँ बड़ी हैं। इन चुनौतियों से वह एक बड़ी लकीर खींचकर ही पार पा सकते हैं। और यह बड़ी लकीर वे "सबका साथ सबका विकास" के अपने नारे पर मज़बूती से अमल करते हुए ही खींच सकते हैं।

हथियार और दुनिया

(15 नवंबर 2015)
एक आदमी है जो हथियार बनाता है और बेचता है।
एक आदमी है जो हथियार खरीदता है और इससे खेलता है।
एक तीसरा आदमी भी है, जो न हथियार बनाता-बेचता है, न ख़रीदता-खेलता है
लेकिन हिंसा का सारा दंश वही झेलता है।
मैं पूछता हूं- ये पहले दो आदमी कौन हैं?
मेरी समूची दुनिया मौन है।
(धूमिल की कविता "रोटी और संसद" से प्रेरित)

आज गोडसे-भक्त कह रहे होंगे- थैंक्यू मीडिया... थैंक्यू कांग्रेस !

(15 नवंबर 2015)
आज कुछ चैनलों ने बताया कि कुछ लोग महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का बलिदान दिवस मना रहे हैं। इन्हीं चैनलों ने यह भी बताया कि कार्यक्रम में 50 लोग भी नहीं जुटे। 125 करोड़ लोगों के देश में जिस विचार के लिए 50 लोग भी नहीं जुटे, उसे सारे चैनलों ने दिन भर अपनी प्रमुख हेडलाइंस में जगह दी।
ये लोग पहले भी गोडसे का बलिदान दिवस मनाते रहे हैं, लेकिन बीजेपी सरकार बनने से पहले कभी किसी चैनल ने उसे कवरेज नहीं दिया, न कांग्रेस ने इनके खिलाफ मोर्चा निकाला। लेकिन इस बार जिस कार्यक्रम में 50 लोग भी नहीं जुटे, उसके विरोध में सैकड़ों कांग्रेसियों ने मोर्चा निकाला।
ऐसा भी नहीं है कि सरकार या आरएसएस के किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति ने गोडसे-भक्तों का समर्थन किया हो। इन्हीं चैनलों पर मनमोहन वैद्य का बयान भी देखा। वे साफ़ कह रहे थे कि ऐसा करने वाले लोग देश और हिन्दुत्व को नुकसान पहुंचा रहे हैं। देश के किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति ने गोडसे के समर्थन में कुछ नहीं कहा।
फिर इन मुट्ठी भर लोगों को इस साल इतनी तरजीह दिए जाने के पीछे का एजेंडा क्या है? वे कौन लोग हैं, जो मीडिया के कंधे पर रखकर अपनी बंदूकें चला रहे हैं? और इन बंदूकबाज़ों का असली मकसद क्या है? क्या वे जबरन यह स्थापित करना चाहते हैं कि डेढ़ साल में अचानक इस देश में हिन्दू-असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि लोग गांधी को छोड़कर गोडसे के पीछे चल पड़े हैं?
जवाब आप लोग भी तलाशें। पर मुझे तो लगता है कि ऐसे आयोजनों, जिनमें न कोई दम है, न जिन्हें कोई समर्थन है, उन्हें इतनी तरजीह देना भी एक प्रकार से गांधी का अपमान करना है। जो लोग बंद कमरे में कुंठित होते रहते थे, उन्हें इतनी पब्लिसिटी मिल गई, और क्या चाहिए? इतना ही नहीं, आपने यह स्थापित किया कि इस देश में गांधी की स्वीकार्यता निर्विवाद नहीं है।
क्या 2015 में इसे ही ज़िम्मेदार पत्रकारिता और ज़िम्मेदार राजनीति कहते हैं? आज गोडसे-भक्त कह रहे होंगे- थैंक्यू मीडिया... थैंक्यू कांग्रेस!

नीतीश जी के लिए अवसरवाद ही सब कुछ?

(16 नवंबर 2015)

साफ़ है कि नीतीश कुमार मोदी-विरोधी राजनीति के झंडावरदार बनना चाहते हैं, सेकुलरिज्म से उनका कोई लेना-देना नहीं, वरना शिवसेना के साथ यारी गांठने की कोशिश नहीं करते। 
सबको पता है कि शिवसेना उग्र हिंदुत्व और क्षेत्रवाद की राजनीति करती है और जिस तथाकथित असहिष्णुता की बात एंटी-बीजेपी कैंप कर रहा है, शिवसेना उसकी सबसे बड़ी प्रतीकों में से है। 
हाल-फिलहाल असहिष्णुता की चर्चा में जिस कालिख-काण्ड की भी चर्चा गरम थी, उसकी सूत्रधार शिवसेना ही थी। इतना ही नहीं, शिवसेना की ही वजह से ग़ुलाम अली का शो मुंबई में नहीं हो सका।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नीतीश कुमार आज अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे हैं कि शिवसेना ने बिहार के लोगों पर महाराष्ट्र में कितने हमले कराये हैं और उन्हें कितना नुकसान पहुँचाया है।
मुझे समझ में नहीं आता कि नीतीश कुमार के लिए विचारों के लिए प्रतिबद्धता भी कोई चीज़ है कि नहीं? या अवसरवाद ही सब कुछ है?

आज़मख़ानी कीड़े से बचिए और देश को बचाइए

(17 नवंबर 2015)

आज़मख़ानी कीड़ा कीड़े की एक ऐसी प्रजाति है जो लोगों की चेतना को ही चाट जाती है। यहां यह डिस्क्लेमर दे दूं कि अगर इस कीड़े का नाम किसी व्यक्ति से मिलता-जुलता हो, तो इसकी ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की ही होगी, मेरी नहीं।
अगर क्रिया-प्रतिक्रिया सिद्धांत के हिसाब से बेकसूर लोगों पर पेरिस जैसे हमले को भी जस्टिफाइ किया जा सकता है, तो फिर दुनिया में हिंसा की ऐसी कोई घटना नहीं, जिसे जस्टिफाइ न किया जा सके।
***फिर तो सचमुच 13 साल बाद भी जो लोग हाथ धोकर मोदी के पीछे पड़े हैं, वे ग़लत हैं,क्योकि सबको पता है कि गुजरात दंगा गोधरा कांड की प्रतिक्रिया थी?
***फिर तो 31 साल बाद भी हम क्यों कोसते हैं कांग्रेस को, जबकि सबको मालूम है कि दिल्ली का सिख-विरोधी दंगा इंदिरा गांधी की हत्या की प्रतिक्रिया थी?
***फिर क्यों आंसू बहाएं हम उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस को ज़िंदा जला दिए जाने पर, जबकि सबको पता है कि धर्मांतरण की घटनाओं के ख़िलाफ़ एक तबके में ग़ुस्सा था?
***फिर तो गांधी के हत्यारे के महिमामंडिन पर भी हम क्यों हायतौबा मचाएं, क्योंकि सबको पता है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाने के लिए गांधी जी के अनशन की प्रतिक्रया में गोडसे ने की थी उनकी हत्या?
***क्या आपको लगता है कि आज तक देश में कोई भी दंगा ऐसा हुआ है, जिसे किसी न किसी क्रिया की प्रतिक्रिया न ठहराया जा सके?
अगर नहीं, तो आज़मख़ानी कीड़े से बचिए और देश को बचाइए। इस कीड़े से प्रभावित लोग हर जाति और हर धर्म में पाए जाते हैं, लेकिन ऐसे कीड़े किसी जाति या धर्म के लिए फ़ायदेमंद नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें ही चट कर जाते हैं।

हे कांग्रेसी बंधुओ, थोड़ा और आगे बढ़िए और तख्ता पलट दीजिए

(18 नवंबर 2015)

सिर्फ़ पाकिस्तानी मीडिया में गुहार लगाना काफी नहीं है। मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और सलमान ख़ुर्शीद को लेकर तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाइए, जो भारत में तख्तापलट करवाने के लिए ISI, ISIS, लश्कर और तालिबान से भी बात करे।
इसके अलावा, यह कमेटी मुशर्रफ़ को ज़रूर कंसल्ट करे। उनके पास ओसामा बिन लादेन जैसे कई "हीरो" हैं, जो वास्तव में दिग्विजय सिंह "जी" के भी हीरो हैं। अलावा उन्हें तख्तापलट का भी कामयाब अनुभव है। एक नया करगिल करने के लिए भी उन्हें प्रेरित किया जा सकता है।
लेकिन सिर्फ़ आतंकी संगठनों और रिटायर्ड जनरलों के सहयोग से बात नहीं बनेगी। दुनिया के प्रमुख देशों का सहयोग भी ज़रूरी है। इसलिए सोनिया गांधी इटली की सरकार से और राहुल गांधी ब्रिटेन की सरकार से अपनी नई-पुरानी नागरिकताओं की दुहाई देते हुए बात करें।
सोनिया और राहुल को पुराने संबंधों की दुहाई देते हुए रूस से भी अवश्य बात करनी चाहिए। पुतिन अभी मोदी से पक्का चिढ़े होंगे। इस अभियान में समाजवादी पार्टी को भी साथ लीजिए और आज़म ख़ान को समझाइए कि यूएन में गुहार लगाने का यही है सबसे सही मौका।
वामपंथियों को साथ लेकर चीन और नेपाल से भी सहयोग मांगिए। वामपंथी काडर देश में अंदरूनी हलचल मचाने में भी काफी कारगर हो सकते हैं। इतना ही नही। ज़रा यह भी देखिए कि माओवादियों को किस तरह अपनी गतिविधियां बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
बुद्धिजीवियों को भी बोल दीजिए कि विदेशी पैसे पर धुआंधार सभाएं-सेमिनार करके देश के अंदर माहौल बनाने में जुट जाएं। पुरस्कार तो सारे लौटा चुके हैं। इक्का-दुक्का बचे हों, तो उनसे भी लौटवा दीजिए। साथ ही देखिए कि लौटाने के लिए और क्या-क्या बचा है?
कुछ लोग लोकसभा चुनाव से पहले देश की नागरिकता छोड़ने की बात कर रहे थे। उन्हें फिर से टटोलिए। उनमें से अगर 10-20 बुद्धिजीवियो को भी आपने नागरिकता त्यागने का एलान करने के लिए राज़ी कर लिया, तो समझ लीजिए, बड़ी कामयाबी हो जाएगी।
बाक़ी आपका फ़र्ज़ है कि पार्लियामेंट के अंदर कोई काम नहीं होने देना है। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि आप ख़ुद जीएसटी लाना चाहते थे? बस यह तय कर लीजिए कि इस सरकार में पास नहीं होने देना है। संसद में अगर घंटे-दो घंटे भी काम चल गया, तो आपकी तौहीन हो जाएगी।
इस असहिष्णु सरकार को अब एक भी दिन सहना प्रलय प्रतीत हो रहा है!

Tuesday, December 8, 2009

ऐसे कमीशन, ऐसी सरकारें, ऐसी राजनीतिक पार्टियाँ लोकतंत्र के लिए घातक हैं

हंगामे के समय सबसे सुचारू रूप से चलती है हमारी संसद!

दोस्तो, यह पोस्ट मैंने लोकसभा टीवी को लाइव देखते हुए लिखी है। उस वक़्त जब लोकसभा में लिबरहान कमीशन की रिपोर्ट पर नियम 193 के तहत चली बहस के बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम सरकार की तरफ़ से जवाब दे रहे थे। क्या विडंबना है कि आम परिस्थितियों में संसद में शायद ही कोई नेता अपना भाषण बिना टोका-टोकी के पूरा कर पाता हो, लेकिन जब बीजेपी के सांसद नारेबाज़ी कर रहे थे, माननीय गृह मंत्री को मौका मिल गया कि वो बिना टोका-टोकी के अपना बयान पढ़ डालें। वो एक सांस में अपना बयान पढ़ते जा रहे थे और बीजेपी के सांसद नारेबाज़ी किए जा रहे थे। इससे पता चलता है कि देश के महत्वपूर्ण मसलों पर हमारे राजनीतिक दलों, सरकार और संसद का रवैया कैसा है। बीजेपी के सांसद इस बात से नाराज़ थे कि कांग्रेस सांसद और पूर्व समाजवादी बेनीप्रसाद वर्मा ने अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी के ख़िलाफ़ "नीच" जैसे असंसदीय शब्द का इस्तेमाल किया। ये अलग बात है कि बेनी प्रसाद का पूरा भाषण ही मुझे असंसदीय लगा। उन्होंने अपने भाषण में न सिर्फ़ "नीच" शब्द का इस्तेमाल किया, बल्कि आडवाणी को "डूब मरने" के लिए भी कहा, क्योंकि वो पाकिस्तान से आए हैं। उन्होंने कहा कि ख़ुद अपना जन्मस्थान छोड़कर भाग गए आडवाणी राम के जन्मस्थान की लड़ाई लड़ रहे हैं। बीजेपी सांसदों की मांग थी कि बेनी प्रसाद माफ़ी मांगे। गृह मंत्री चिदंबरम ने तो इसपर सरकार की तरफ़ से माफ़ी मांग ली, लेकिन तमाम दबावों के बावजूद बेनीप्रसाद सिर्फ़ खेद जताकर रह गए, माफ़ी नहीं मांगी।

लोकतंत्र का सरासर उड़ाया जा रहा है मज़ाक

ये पूरी तस्वीर हमें सोचने को विवश करती है। हमारी संसद में इस तरह के नेता हैं जिनपर हमें शर्म आती है। एक तरफ़ बेनी प्रसाद जैसे नेता हैं जिन्हें बोलने का शऊर नहीं है। ऐसे नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बजाय हमारी संसद असहाय दिखती है। दूसरी तरफ़ हमारा विपक्ष है जो सरकार का जवाब सुनने को तैयार नहीं है। अपना विरोध वो दूसरे तरीकों से भी जता सकता था, लेकिन शायद उसकी दिलचस्पी सरकार का जवाब सुनने में है ही नहीं, क्योंकि लिबरहान कमीशन की रिपोर्ट ने आपस में ही लड़-मर रही बीजेपी के लिए संजीवनी बूटी का काम किया है। तीसरी तरफ़ हमारी सरकारें हैं, ख़ुद जिनके लिए भी अयोध्या जैसे संवेदनशील मामले राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए गरम तवे से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। लिबरहान कमीशन जैसे तमाम कमीशन उसके लिए चिमटे का काम करते हैं जिनके जरिए वो ये रोटियाँ सेंकती चली आ रही है।

ज़रा सोचिए, हम ऐसे कमीशनों का क्या करें, जिनके नतीजों से दोषियों को सज़ा तो नहीं मिलती है, उल्टे उन्हें राजनीति करने का मौका मिलता है। सत्रह साल में हज़ार पेज की रद्दी तैयार करने में इस कमीशन ने आठ करोड़ रूपये फूंक डाले, लेकिन हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके। कोढ़ में खाज ये कि सचमुच इस रिपोर्ट में तथ्य की तमाम ग़लतियाँ हैं, जिन्हें ख़ुद सरकार में बैठे लोग भी कबूल कर रहे हैं। और तो और कई सांसदों को तो यहाँ तक बोलने का मौका मिल गया कि अब तो सरकार इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर ये जाँच करवाए कि जिस रिपोर्ट को तैयार करने में जस्टिस लिबरहान ने सत्रह साल लगा दिए, उन्होंने ख़ुद उस रिपोर्ट को पढ़ा भी है कि नहीं। इससे ज़्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। ऐसे आयोगों की रिपोर्टों पर इससे ज़्यादा कुछ कहने को भी नहीं बचता।

बीजेपी आक्रामक, कांग्रेस ढुलमुल

नतीजा सामने है कि बीजेपी एक बार फिर आक्रामक है। बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कल संसद में साफ़ कहा कि अयोध्या में राम मंदिर था, राम मंदिर है और राम मंदिर रहेगा। आज सुषमा स्वराज ने भी सीना ठोंककर कहा कि जो लिबरहान ने नहीं बताया- हमसे पूछ लो। हम बताते हैं। अगर ये पूछोगे कि अयोध्या में ढांचा ढहा, तो मैं कहूँगी कि हाँ ढहा। अगर ये पूछोगे कि क्या इसके ढहने के पीछे साज़िश थी, तो मैं कहूँगी साज़िश नहीं थी, ये जनांदोलन का परिणाम था। और अगर ये पूछोगे कि क्या आप सज़ा भुगतने को तैयार हैं तो हाँ हम तैयार हैं। जो 6 दिसंबर 1992 को घटनास्थल पर थे, वो नेता भी और जो नहीं थे, वो नेता भी। जो नेता सदन के अंदर हैं वो भी और जो सदन के बाहर हैं, वो भी। दूसरी तरफ़, कांग्रेस एक बार फिर ढुलमुल दिखाई दे रही है। उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। जिसने पचास साल सत्ता में रहते हुए इस मामले को दिन-दिन सुलगने दिया, जिसने मंदिर का ताला खुलवाया, जिसने राम जन्मभूमि परिसर में मंदिर का शिलान्यास कराया, और दूसरी किसी भी पार्टी से ज़्यादा शातिराना अंदाज़ में पिछले साठ साल से हिन्दू और मुसलमान वोटों की राजनीति करती आ रही है। ये अलग बात है कि फिर भी उसके माथे पर धर्मनिरपेक्षता का ठप्पा लगा हुआ है।

मैं ऐसे तमाम कमीशनों, ऐसी सरकारों और ऐसी तमाम राजनीतिक पार्टियों की तीखी भर्त्सना करता हूँ जो हमारे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने में जुटी हैं।



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