Showing posts with label अभिरंजन कुमार. Show all posts
Showing posts with label अभिरंजन कुमार. Show all posts

Monday, June 20, 2016

अभिरंजन कुमार को प्रतिष्ठित नारद सम्मान



अभिरंजन कुमार को सम्मानित करते श्री अरुण जेटली
नई दिल्ली। 20 मई 2016. 

जाने-माने कवि और पत्रकार अभिरंजन कुमार को पत्रकारिता जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए केंद्रीय वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने प्रतिष्ठित नारद सम्मान से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें आदि पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती के मौके पर इन्द्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र द्वारा कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में आयोजित पत्रकार सम्मान समारोह में दिया गया।

अभिरंजन कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार चैनलों के संपादकीय प्रमुख रह चुके हैं। साथ ही, उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें “बचपन की पचपन कविताएं” और “उखड़े हुए पौधे का बयान” ख़ासे चर्चित रहे हैं। अभिरंजन ने सम्मान में मिली 11 हज़ार रुपये की राशि प्रधानमंत्री सूखा राहत कोष में दान कर दी।


कार्यक्रम में सात अन्य पत्रकारों को अलग-अलग श्रेणियों में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इनमें श्याम खोसला, मनमोहन शर्मा और डॉ. शंकर शरण प्रमुख थे। श्रेष्ठ छायांकन के लिए उत्कृष्ट छायाकार नारद सम्मान स्व. श्री रवि कन्नौजिया को मरणोपरांत प्रदान किया गया।

कैराना ही नहीं, दादरी भी कानून-व्यवस्था का ही मामला था जहांपनाह!

(18 जून 2016)

उत्तर प्रदेश के कैराना इलाके से ख़ास समुदाय के लोगों के पलायन पर मीडिया में कई दिनों से तरह-तरह की रिपोर्टें आ रही हैं, लेकिन हम चुप रहे। चुप इसलिए रहे कि देख लेते हैं मामला क्या है! "कौवा कान लेकर भागा" जैसी स्थिति कम से कम समाज के सोचने-समझने वाले लोगों को पैदा नहीं करनी चाहिए।

यह अलग बात है कि जुगाड़-पूर्वक साहित्य अकादमी के विभिन्न पुरस्कार हथिया लेने वाले कम्युनिस्ट और कांग्रेसी लेखकों ने दादरी कांड के बाद सोचने-समझने में अपना समय तनिक भी बर्बाद नहीं किया और बिल्कुल दंगाइयों की तरह व्यवहार किया। उनके सामने तो बस सियासी आकाओं से मिला एक ही एजेंडा था कि बिहार चुनाव में फ़ायदे के लिए कैसे भी इस मामले को सांप्रदायिक रंग देकर तूल देना है।

आज जिस तरह से कैराना से हुए पलायन को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बताकर देश के मीडिया और बुद्धिजीवियों ने ज़िम्मेदारी का परिचय दिया है, अगर दादरी कांड के बाद भी इसी ज़िम्मेदारी से काम लिया गया होता, तो आज हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक दीवार-सी खड़ी नहीं हो गई होती। नफ़रत पल भर में पैदा की जा सकती है, लेकिन सद्भावना कायम करने में सालों-साल लग जाते हैं।

हमने तब भी बार-बार यही कहा था कि आख़िर हिंसा की कौन-सी ऐसी घटना है, जिससे कानून-व्यवस्था के दायरे में नहीं निपटा जा सकता है? अगर कहीं सांप्रदायिक हिंसा भी होती है, तो वास्तव में वह कानून-व्यवस्था के ही फेल होने का मामला होती है। और ऐसी हिंसा दोबारा न होने पाए, इसके लिए भी कानून-व्यवस्था को ही चाक-चौबंद करने की ज़रूरत होती है।

जातिवादी और सांप्रदायिक नज़रिए से तो अक्सर घटनाओं को जातीय और सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता है, क्योंकि अपराधी भी किसी न किसी जाति या मजहब से तो ताल्लुक रखते ही हैं। और तो और, अपराधियों को भी यही सूट करता है कि आप घटनाओं को जातीय और सांप्रदायिक रंग दें, ताकि उन्हें अपनी बिरादरी के लोगों की सहानुभूति प्राप्त हो सके।

आपको याद होगा कि क्रिकेटर अजहरुद्दीन और अभिनेता सलमान ख़ान से लेकर जेएनयू देशद्रोह कांड के आरोपी उमर ख़ालिद तक जब किसी मामले में फंसते हैं, तो अचानक उन्हें अपनी जातीय और सांप्रदायिक पहचान याद आ जाती है। उनका फौरी बयान यही होता है कि अमुक जाति या संप्रदाय का होने के कारण उन्हें फंसाया जा रहा है। यानी जब भी आप जाति और संप्रदाय को किसी घटना के बीच में लाते हैं, तो वस्तुतः अपराधियों की ही मदद कर रहे होते हैं।

आज देश में जितने भी हिस्ट्रीशीटर अपराधी संसद और विधानसभाओं में सुशोभित हो रहे हैं, वे सभी अपनी-अपनी जातियों और संप्रदायों के लोगों की भावनाओं का दोहन करके ही वहां पहुंच पाए हैं। हम और आप अपनी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बातों से चाहे-अनचाहे उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक बनते हैं और फिर एक तरफ़ इस बात को लेकर कुढ़ते भी रहते हैं कि सियासत में अब शरीफ़ लोगों की जगह नहीं और दूसरी तरफ़ जनता के विवेक पर भी सवाल खड़े करते हैं।

कैराना की घटना से साफ़ है कि अधिकांश अपराधी ख़ास समुदाय के हैं और पलायन करने वाले अधिकांश पीड़ित दूसरे समुदाय के। इसलिए बहुत आसान था, यह कह देना कि एक समुदाय के आतंक से दूसरे समुदाय के लोग भाग रहे हैं और एक सियासी धड़े के द्वारा वास्तव में कहा भी यही गया। लेकिन जब मीडिया और बुद्धिजीवियों ने इस थ्योरी का विरोध किया, तो वे अपने रुख में बदलाव लाने को मजबूर हुए और उन्हें मानना पड़ा कि मामला सांप्रदायिक नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था का है। यह ज़िम्मेदारी और समझदारी भरी रिपोर्टिंग की जीत है।

लेकिन दादरी की घटना के बाद ऐसी ज़िम्मेदारी और समझदारी नहीं दिखाई गई। बार-बार हिन्दू, मुसलमान और गो-मांस को लपेटा गया। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने देश के सांप्रदायिक सद्भाव पर दुधारी तलवार चलाई। एक तरफ़, बार-बार यह कहकर कि हिन्दुओं की भीड़ ने एक मुसलमान को मार डाला, हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों की नफ़रत को भड़काया। दूसरी तरफ़, गो-मांस के मुद्दे पर हिन्दुओं की भावनाओँ की लगातार अनदेखी करके मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं की नफ़रत को भड़काया।

याद कीजिए, दादरी कांड के बाद एक कुटिल कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने हिन्दुओं को चिढ़ाते हुए कहा कि अब तो मैं ज़रूर गो-मांस खाऊंगा। दूसरी तरफ़, मां की कोख से ही क्रांतिकारी पैदा होने वाले कम्युनिस्टों ने सड़क पर गो-मांस खाते हुए जुलूस निकाला। ऐसी और भी कई घटनाएं हुईं, जिनसे लगा कि देश के तमाम पागलखानों की दीवारें तोड़कर सारे पगलाए हुए लोग मीडिया, सियासत और साहित्य में घुस गए हैं।

जबकि, जैसे हर घटना को कानून-व्यवस्था के दायरे में डील किया जा सकता है, वैसे ही दादरी की घटना को भी किया जा सकता था और किया गया। उस घटना को हिन्दू-मुस्लिम रंग देने की चाहे जितनी भी कोशिशें हुईं, लेकिन न तो इस्लाम की रक्षा के लिए अल्लाह ने किसी पैगंबर को भेजा, न हिन्दुत्व के उद्धार के लिए किसी देवी या देवता का अवतरण हुआ। हालात को संभालने के लिए कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियां ही बीच में आईँ। न कुरान की आयतें आईं, न पुराण के श्लोक आए। आईं आईपीसी की वह धाराएं ही, जिनके मुताबिक संदिग्धों को पकड़कर दोषियों को सज़ा दिलाने की कार्रवाई शुरू की जा सकी।

आज अगर बाबा कबीरदास जीवित होते, तो हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाने की ताक में लगे रहने वाले इन सारे पुरस्कार-प्राप्त लेखकों का मुंह नोंच लेते। उनकी वे ऐसी धुलाई करते कि ये लोग चूहे की तरह किसी बिल में घुस जाते और जनता को भी यह अहसास हो जाता कि जिनमें संवेदना नहीं, वे साहित्यकार कैसे? जिनमें विवेक नहीं, वे बुद्धिजीवी किस बात के?

आज अगर बाबा कबीरदास होते, तो निश्चित रूप से यही कहते-
“न कुरान, न पुराण
याद रखो देश का संविधान।
न ईश्वर, न अल्लाह
इंसानियत सबसे ऊपर है जहांपनाह!”

आख़िर उन्होंने तो कहा ही था न-
“मंदिर तोड़ो, मस्जिद तोड़ो, यह सब खेल मज़ा का है
पर किसी का दिल मत तोड़ो, यह तो वास ख़ुदा का है।“

राहुल बाबा फिर विदेश चले गए हैं (कविता)















राहुल बाबा फिर विदेश चले गए हैं
किस देश गए हैं, बताकर नहीं गए, वरना ज़रूर बताता
उनकी ग़ैर-मौजूदगी में बड़ी अकेली पड़ जाती हैं उनकी माता!

कितने दिन के लिए गए हैं, यह भी तो उन्होंने बताया नहीं
क्या करने गए हैं, इस बारे में भी कुछ जताया नहीं
जून की इन सुलगती गर्मियों में पार्टी के लोग हो गए बिना छाता!

मुझे चिंता हो रही है कांग्रेस की, जिसे सर्जरी की ज़रूरत है
और सर्जरी की डेट टलती ही जा रही है
130 साल पुरानी काया अब गलती ही जा रही है
पर जो सर्जन है, वही फिर रहा है क्यों छिपता-छिपाता?

राहुल बाबा का जी अगर है ज़िम्मेदारी से घबराता
तो प्रियंका बेबी को ही हम बुला लेते
उनके मैजिक की माया में साल दो साल तो ख़ुद को भुला लेते
पर इस अनिश्चय की स्थिति में तो हमें कुछ भी नहीं है बुझाता!

दिग्गी से पिग्गी से, मणि से शनि से भी तो काम नहीं चलता
क्या करें, कांग्रेस में गांधी-नेहरू के सिवा कोई नाम नहीं चलता
ये कैसे कठिन समय में हमें डाल दिया, हे दाता!

पहले वाले दिन कितने अच्छे थे।
एक मम्मी थी और हम ढेर सारे बच्चे थे।
न कोई बही थी, न था कोई खाता।
जो जी में आता, वही था खा जाता।

(20 जून 2016)

Wednesday, May 11, 2016

अपने जातिवादी और सांप्रदायिक मित्रों से दो टूक

(11 मई 2016)

मेरे कई मित्रों की मुश्किल है कि जब मैं मोदी, बीजेपी और आरएसएस की आलोचना करता हूं, तो वे पढ़ते नहीं या पढ़कर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन जब मोदी, बीजेपी, आरएसएस के विरोधियों की आलोचना करता हूं, तो वे हमारी निष्ठा पर सवाल उठाने लगते हैं।

जब तक हमारे ऐसे मित्र जातिवादी और सांप्रदायिक नज़रिए से सोचते रहेंगे, तब तक उन्हें मेरी बातें सूट नहीं करेंगी और इसमें मैं उनकी कोई मदद भी नहीं कर सकता, क्योंकि उनके दिमाग में नफ़रत और नकारात्मकता का ज़हर भरा हुआ है। हमारे ऐसे मित्र ज़रा इंटरनेट सर्च कर लें। मेरे सैकड़ों आर्टिकल्स उन्हें मोदी, बीजेपी, आरएसएस और हिन्दुत्ववादी शक्तियों के ख़िलाफ़ भी मिल जाएंगे, जिन्हें उन्होंने या तो पढ़ा नहीं या पढ़कर इग्नोर कर दिया।

मैं कई बार साफ़ कर चुका हूं कि मोदी-विरोध और सरकार-विरोध एक बात है, लेकिन देश-विरोध और मानवता-विरोध दूसरी बात है। मेरी मजबूरी यह है कि मैं मोदी, बीजेपी और आरएसएस के विरोध में इस हद तक नहीं गिर सकता कि बंदूक के दम पर देश के टुकड़े-टुकड़े करने की सौगंध उठाने वालों का समर्थन करूं या अफ़ज़ल और याकूब जैसे आतंकवादियों के महिमामंडन में कार्यक्रम करने वालों को अपना मसीहा मान लूं।

आप दिन-रात मोदी, भाजपा और आरएसएस को गरियाएं, मेरी बला से। लेकिन आप देश को गरियाएंगे, सीमा पर रोज़ हमारे-आपके लिए जान देने वाले जवानों को गरियाएंगे, बेगुनाहों की जान लेने वाले आतकंवादियों का महिमामंडन करेंगे, उन्हें बिहार की बेटी और देश का लाल- वगैरह वगैरह बताएंगे, तो मैं पूरी ताकत से आपके चेहरे का नकाब नोंच डालने की कोशिश करूंगा।

मेरे लिए देश महानतम है और मोदी मामूली है। इसलिए मैं चाहता हूं कि देश के असली मुद्दों पर बात करो। गरीब-गुरबों की बात करो। किसानों-मजदूरों की बात करो। रोटी-पानी की बात करो। महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार की बात करो। सियासी मिलीभगत से शिक्षा-स्वास्थ्य को हाइजैक कर चुके माफिया की बात करो। बच्चे मिड डे मील खाकर मर जाते हैं, उनकी बात करो। बहन-बेटियों के रेपिस्टों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, उसकी बात करो। नेताओँ की बिगड़ैल औलादों की बात करो। राजनीति और अंडरवर्ल्ड के एक जैसा हो जाने पर बात करो।

अगर मोदी से प्रॉब्लम है, तो सरकार के परफॉरमेंस पर बात करो। ये क्या हुआ कि कभी उसकी बीवी के पीछे पड़ गए, कभी उसकी डिग्री के पीछे पड़ गए, कभी उसके सूट के पीछे पड़ गए? इसलिए अगर आप लोग बौरा गए हैं, सनसनी और पागलपन बेचना चाहते हैं, जनता को मूर्ख बनाने में आपको मज़ा आने लगा है, तो इस नीच-कर्म में मुझे अपना शागिर्द क्यों बनाना चाहते हैं?

एक बात और। जब भी आप मेरी बातों को संदर्भ से काटकर उसे अलग रंग देना चाहते हैं या मुझे भक्त, निक्करधारी इत्यादि घोषित करने की कोशिश करते हैं, तो मुझे पता चल जाता है कि आप स्वयं कितने बड़े जातिवादी और सांप्रदायिक व्यक्ति हैं। मेरी सारी डिग्रियां असली हैं और आप जैसे तमाम लोगों से अधिक पढ़ा-लिखा हूं मैं।

यह तो मैं लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और विचार एवं अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान करने वाला एक सहिष्णु भारतीय हूं, इसलिए आपको "आदरणीय" और "परम आदरणीय" लिखकर समझाता रह जाता हूं और आपसे यह भी नहीं कहता कि पहले अपने लहू से जातिवाद और सांप्रदायिकता का ज़हर निकालिए, फिर मुझसे बात कीजिए।

आशा है, मेरे सभी जातिवादी और सांप्रदायिक मित्र आज ही से अपनी रक्त-शुद्धि के लिए चिरौता पीना शुरू कर देंगे और दिमाग की दुरुस्ती के लिए अखरोट, बादाम और शंखपुष्पी का भी सेवन करने लगेंगे। अगर इतने से भी समस्या हल नहीं होती, तो निश्चित रूप से उन्हें किसी अच्छे मनो-चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि नफ़रत और नकारात्मकता से बड़ी कोई बीमारी नहीं।

सादर शुक्रिया।

Wednesday, March 16, 2016

हम छप्पन इंच की छाती का दम देखना चाहते हैं मोदी जी!

(28 फरवरी 2016)

हाल के महीनों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर गुजरात में पटेलों ने, मालदा और पूर्णिया में अल्पसंख्यकों ने, आंध्र प्रदेश में कापुओं ने और हरियाणा में जाटों ने जिस बड़े पैमाने पर हिंसा मचाई है, वह सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि देश के ख़िलाफ़ भी बड़ी साज़िश की तरफ़ इशारा है।

क्या सरकार को इन साज़िशों की भनक है? और अगर है, तो वह इन्हें बेनकाब करने के लिए, साज़िशकर्ताओं को पकड़ने व सज़ा दिलाने के लिए और आगे ऐसी घटनाएं न होने देने के लिए क्या कर रही है? क्या कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता भी इनमें शामिल हैं? सरकार इतनी डिफेंसिव क्यों है?

फिलहाल तो मुझे साज़िशकर्ता सफ़ल दिखाई दे रहे हैं। सरकार विफल दिखाई दे रही है। हम छप्पन इंच की छाती का दम देखना चाहते हैं! क्या यह दिखेगा? या इसी तरह उत्पाती उस छाती को रौदकर निकल जाया करेंगे?

राहुल की राष्ट्रघाती राजनीति की क्षय हो!

खिलाड़ी अगर अंपायर के फ़ैसले पर असंतुष्टि ज़ाहिर कर दे, तो उसे सज़ा हो जाती है। विराट कोहली पर मैच फीस का तीस फीसदी जुर्माना लगा दिया गया है। लेकिन देश का नागरिक अगर सबसे बड़े अंपायर यानी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को "न्यायिक हत्या" कहे, तो वह क्रांतिकारी कहलाता है!

राहुल की राष्ट्रघाती राजनीति की क्षय हो!
(28 फरवरी 2016)



"फूट डालो, फ्रूट खा लो" की नीति पर चलते हैं पढ़े-लिखे लोग!

(16 मार्च 2016)

कोई अगर "भारत माता की जय" या "वन्दे मातरम्" नहीं बोलता, तो न बोले, पर ऐसा भी न कहे कि मेरी गर्दन पर चाकू रख दोगे, तो भी नहीं बोलूंगा। न ही कोई सचमुच इस बात के लिए उसकी गर्दन पर चाकू रख दे कि बोलोगे कैसे नहीं?

यह सब अपनी-अपनी आस्था के विषय हैं। हिन्दुओं में भी आस्तिक और नास्तिक होते हैं। जो नास्तिक होते हैं, वे किसी देवी-देवता की जय नहीं बोलते, तो क्या उन्हें धर्म और समाज से बाहर कर दिया जाना चाहिए या विधर्मी और असामाजिक मान लिया जाना चाहिए?

अगर हमारे मुस्लिम भाइयों-बहनों की अपनी कुछ धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनके चलते वह निराकार एकेश्वरवाद में यकीन रखते हैं और मूर्ति या चित्र रूप में किसी की उपासना नहीं करना चाहते, तो देश के नाम पर ही सही, उनपर ऐसा करने का दबाव नहीं डालना चाहिए।

अगर कोई ये नारे लगाता है कि "भारत तेरी बर्बादी तक जंग रहेगी" या "भारत तेरे टुकड़े होंगे" या "बंदूक के दम पर लेंगे आज़ादी"- तो यह निश्चित रूप से देशद्रोह है। जो उन्हें देशद्रोही नहीं मानकर उनका बचाव और समर्थन करते हैं, मैं उनकी पुरज़ोर निंदा करता हूं।

लेकिन मैं उन लोगों की भी निंदा करता हूं, जो "भारत माता की जय" या "वन्दे मातरम्" नहीं बोलने पर किसी को देशद्रोही घोषित कर देते हैं। मेरे ख्याल से देश के सभी नागरिकों को स्वयं ही यह तय करने दिया जाना चाहिए कि वह अपने मुल्क से किस रूप में मोहब्बत करें।

मुझे सबसे ज़्यादा शिकायत देश के पढ़े-लिखे लोगों से है, जो स्वार्थ के लिए नफ़रत, उन्माद, जातिवाद और सांप्रदायिकता का धंधा कर रहे हैं। पढ़े-लिखे लोग सामूहिक नहीं, व्यक्तिगत फ़ायदे में यकीन रखते हैं, इसलिए वे "फूट डालो, फ्रूट खा लो" की नीति पर चलते हैं।

इसे नियम की तरह तो पेश नहीं किया जा सकता, पर मेरा अनुभव यही है कि पढ़े-लिखे लोग अनपढ़-ग़रीबों की तुलना में अधिक जातिवादी और सांप्रदायिक होते हैं। अगर ये पढ़े-लिखे लोग इतने जातिवादी और सांप्रदायिक न होते, तो ये बुराइयां कब की ख़त्म हो गई होतीं।

इतना ही नहीं, एक अनपढ़-ग़रीब तो इसी मिट्टी में पैदा होता है और इसी की सेवा करते हुए इसी में मिट जाता है। लेकिन एक पढ़ा-लिखा आदमी जैसे ही थोड़ा सक्षम हो जाता है, न सिर्फ़ दूसरे देशों में जा बसने का सपना देखने लगता है, बल्कि बात-बात पर देश बांटने, देश तोड़ने या देश छोड़ने की धमकी भी देने लगता है।

उदाहरण के लिए, आपने विद्वान लेखक यूआर अनंतमूर्ति को देश छोड़ने की धमकी देते सुना, लेकिन क्या कभी किसी अनपढ़-ग़रीब हिन्दू को ऐसी धमकी देते सुना? इसी तरह, आपने विद्वान अभिनेता आमिर ख़ान को भी देश छोड़ने की धमकी देते सुना, पर क्या किसी अनपढ़-ग़रीब मुसलमान को ऐसी धमकी देते सुना?

हमारे पढ़े-लिखे लोग अन्य तरीकों से भी देश की जड़ें खोखली करने में जुटे हैं। भ्रष्टाचार क्या है? अगर इससे देश को नुकसान पहुंचता है, तो क्या यह देशघात नहीं है? और अगर यह देशघात है, तो यह कौन कर रहा है इस मुल्क में?

इसलिए बात हिन्दू-मुसलमान की है ही नहीं। भारत का हर अनपढ़-ग़रीब हिन्दू और मुसलमान देशभक्त है और इसी देश में जीने-मरने की तमन्ना रखता है। यह डिवीज़न और डिस्ट्रक्शन वाला कीड़ा तो दोनों समुदायों के पढ़े-लिखे-सक्षम लोगों के दिमाग में है!


इसका एक निष्कर्ष यह भी है कि प्रॉब्लम हमारी शिक्षा-व्यवस्था में ही है! इसलिए दिल्ली हाई कोर्ट की जज प्रतिभा रानी ने सर्जरी वाली जो बात कही थी, मेरे ख्याल से उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हमारी शिक्षा-व्यवस्था में ही है। पढ़े-लिखे लोगो... शर्म करो।

Thursday, February 18, 2016

अपनी विचारधारा के बारे में दो टूक

मैं जब सड़क पर पैदल चलता हूं या साइकिल चलाता हूं, तो बाएं चलता हूं, ताकि आती-जाती गाड़ियों से अपनी रक्षा कर सकूं। जब कार चलाता हूं, तो दाएं चलता हूं, ताकि आते-जाते पैदल या साइकिल यात्रियों को मेरी वजह से परेशानी न हो। जहां कहीं दाएं या बाएं मोड़ हो और मुझे सीधा जाना हो, तो गाड़ी बीच की लेन पर ले आता हूं।

जीवन भी इसी तरह चलता है। जड़ता और हठधर्मिता से काम नहीं चलता। विचारों को लेकर कट्टरता महामूर्ख लोग रखते हैं। कोई भी विचार संपूर्ण नहीं होता। ग़रीब-गुरबों-मज़दूरों-किसानों के सवालों पर शायद मैं वामपंथ के करीब हूं। देश, माटी, भाषा, संस्कृति के सवालों पर शायद मैं दक्षिणपंथ के करीब हूं। सभी जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा, विचारों के लोगों को साथ लेकर चलना है, इसलिए मध्यमार्गी हूं, सहिष्णु हूं।

अगर मैं सिर्फ़ वामपंथ या दक्षिणपंथ को मानता, तो जड़ होता, कट्टर होता, हठधर्मी होता, पढ़ा-लिखा मूर्ख होता, हिंसक होता, असहिष्णु होता, वैचारिक छुआछूत रखता, सामने वाले को बर्दाश्त कर पाने का साहस नहीं रखता। अगर मैं सिर्फ़ कांग्रेसी होता, तो धूर्त होता, शातिर होता, ढुलमुल होता, भ्रष्ट होता, चापलूसी-पसंद होता, हर वक्त साज़िशें रचता और अपने फ़ायदे के लिए हर विचार और सरोकार का सत्यानाश करने पर आमादा रहता।

मैं लकीर का फकीर नहीं हूं। मैं किसी एक ग्रंथ को धर्म नहीं मान सकता। मैं किसी एक किताब से अपना सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक व्यवहार तय नहीं कर सकता। मैं किसी एक नेता को अपना ख़ुदा या किसी एक ख़ुदा को अपना नेता नहीं मान सकता। मैं किसी एक विचार के शिकंजे में जकड़कर अन्य विचारो से नफ़रत नहीं कर सकता। दुनिया सिर्फ़ मेरी नहीं है। मैं अकेला इस दुनिया का नहीं हूं। मैं सबके साथ रहना चाहता हूं। मैं सबको साथ रखना चाहता हूं।

मैं विचारों को व्यक्तिगत संबंधों के बीच में कभी नहीं आने देता। जो मुझसे सहमत हैं, उनका भी स्वागत है। जो मुझसे असहमत हैं, उनका और भी स्वागत है। मेरे साथ चाय पीते हुए आप मुझसे बिल्कुल उलट विचार रख सकते हैं और मैं इसे अत्यंत सहजता से लेता हूं। मेरे फोरम पर आकर आप मेरी पूरी आलोचना कर सकते हैं और कभी मुझे अपनी मर्यादा और संयम खोते हुए नहीं पाएंगे आप। मैं ऐसा इसलिए हूं क्योंकि मैं शायद भारतीय होने के गूढ़ अर्थ, विनम्रता भरी गरिमा और महती ज़िम्मेदारी को समझता हूं।

मैं अपनी बात को मज़बूती और बेबाकी से रखना चाहता हूं। जीवन एक ही बार मिला है, इसलिए मैं डिप्लोमैटिक होकर वह लिखने-बोलने से बचने की मूर्खता नहीं कर सकता, जो मैं महसूस करता हूं। मैं ग़रीबी, भुखमरी, अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक निर्णायक लड़ाई चाहता हूं। मैं जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद के ख़िलाफ़ भी एक निर्णायक लड़ाई चाहता हूं। मैं देश की एकता और अखंडता के सवाल पर समझौता नहीं कर सकता। वसुधैव कुटुम्बकम यानी पूरी धरती हमारी है, लेकिन व्यवस्था बनाए रखने के लिए देश मानव-हित में हैं।

मेरे जो भी विचार हैं, मेरे अपने हैं। मेरे जो भी विचार हैं, मैं उनपर पक्का हूं। मैं अपने विचारों में कभी किसी पल भी ढुलमुल नहीं हूं। मैं अपनी आलोचनाओं से कभी विचलित नहीं होता हूं। जब मैंने साहित्य, मीडिया और सामाजिक जीवन में आने का निर्णय किया, तभी मैंने यह तय कर लिया कि मैं अपने हिसाब से चलूंगा। किसी से डिक्टेट होकर चलना मेरी फितरत में नहीं है। किसी का यसमैन आज तक नहीं बना, तो अब क्या बनूंगा!

मैं लोकतंत्र में समस्त राजनीतिक दलों को एक पक्ष और जनता को दूसरा पक्ष मानता हूं। इसलिए मैं कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। मैं हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा रहता हूं और रहूंगा। इसलिए मैं जन-पक्षधर हूं, निष्पक्ष नहीं हूं।

जब सिर्फ़ अलग-अलग राजनीतिक दलों को संदर्भ में रखेंगे, तो यह संभव है कि आपको ऐसा लगे कि मैं किसी विशेष के पक्ष में झुका हुआ हूं। लेकिन यह देश और जनता के हितों की मेरी निजी समझ के मुताबिक, विशुद्ध रूप से मुद्दों के आधार पर होता है, न कि उस दल विशेष के लिए मेरे किसी स्थायी झुकाव की वजह से। अगर कभी मुद्दों के आधार पर मेरा ऐसा झुकाव बनता भी है, तो वहां प्रतिकूल सोच रखने वालों के लिए पूरा स्पेस छोड़ता हूं।

बाबा रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है- "यदि तुम्हारी आवाज़ सुनकर कोई न आए, तब अकेले चलो।" मैं अकेला चल रहा हूं। जो साथ हैं, उनका स्वागत। जो साथ नहीं हैं, उनका भी पूरा-पूरा सम्मान। सबसे मोहब्बत है। गिला किसी से नहीं। इंसानियत मेरा धर्म। भारतीय मेरी जाति। जय हिन्द।

(18 फरवरी 2016)

Thursday, November 26, 2015

सच्ची शराबबंदी लागू कर दें, तो हम भी करेंगे नीतीश की जय-जय

(26 नवंबर 2015)

अगर नीतीश कुमार सचमुच बिहार में प्रभावशाली तरीके से शराबबंदी लागू कर पाए, तो उनसे मेरी आधी शिकायतें दूर हो जाएंगी। शराब बहुत सारी बुराइयों की जड़ है। इसकी वजह से महिलाओं का जीवन नरक बन जाता है, बच्चों पर बुरा असर पड़ता है, लोग बड़ी संख्या में गंभीर बीमारियों के शिकार होते हैं, बड़े पैमाने पर दुर्घटनाएं होती हैं, कानून-व्यवस्था के हालात बिगड़ते हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और देश की कार्यशक्ति और अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष और परोक्ष चोटें पड़ती हैं।

कारगर शराबबंदी के लिए नीतीश कुमार को आग के ढेर से गुज़रना होगा। देश के अन्य हिस्सों की ही तरह बिहार में भी शराब माफिया बहुत पावरफुल है। ख़ुद नीतीश जी की टोली में कई लोग ऐसे होंगे, जो शराब के धंधे से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होंगे। नीतीश जी को उनपर लगाम कसनी होगी। शराबबंदी का असली मकसद तभी हासिल होगा, जब गली-गली अवैध शराब की भट्ठियां न लग जाएं। बिहार में ज़हरीली शराब से हर साल बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। बिहार पुलिस के एक आला अधिकारी ने कहा था कि बिहार में जितनी शराब वैध तरीके से बिकती है, उतनी ही अवैध तरीके से भी बिकती है।

इतना ही नहीं, इस वक्त शराब से बिहार को करीब साढे तीन हज़ार करोड़ रुपये के सालाना राजस्व की प्राप्ति होती है। नीतीश जी को इसका लालच छोड़ना होगा। अपने पिछले कार्यकाल में शराब से प्राप्त पैसे पर वह इस हद तक निर्भर हो गए थे कि यहां तक कह दिया था कि लोग शराब पिएंगे, तभी तो लड़कियों की साइकिलों के लिए पैसे आएंगे। इस बयान के चलते उनकी काफी आलोचना हुई थी और बिहार की कई होनहार बेटियां सरकारी साइकिलें लौटाने पहुंच गई थीं।

लेकिन अब चूंकि ऐसा लग रहा है कि सरस्वती ने नीतीश जी को सद्बुद्धि प्रदान कर दी है, इसलिए पुरानी बातों से आगे बढ़ते हुए हमें उनका समर्थन करना चाहिए और बिहार में सच्ची शराबबंदी के रास्ते पर बढ़ने में उनकी मदद भी करनी चाहिए, अगर वे डगमगाते हैं तो संभालना भी चाहिए और अगर भागने की कोशिश करते हैं तो दबाव भी बनाए रखना चाहिए।

नीतीश जी से आधी शिकायत हमें शराब को बढ़ावा देने के लिए थी और आधी शिकायत मुख्य रूप से इन दो वजहों से रही-
1. पहली इस बात के लिए कि लड़कियों को साइकिलें बांटकर उन्होंने सुर्खियां तो बटोरीं, लेकिन कुल मिलाकर बिहार की सरकारी शिक्षा को ध्वस्त कर दिया। उनके दूसरे टर्म में बिहार भर के शिक्षक भी आंदोलनरत् रहे। बच्चे भी आंदोलनरत् रहे। पढ़ाई का स्तर निचले पायदानों तक पहुंच गया। मिड डे मील में भ्रष्टाचार और लापरवाही इस हद तक बढ़ गई कि ग़रीबों के बच्चों को जगह-जगह ज़हरीला खाना खिलाया गया। छपरा के धर्मासती गंडामन गांव में तो भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटना हुई, जिसमें मिड डे मील खाने से 23 बच्चों की मौत हो गई थी।
2. दूसरी इस बात के लिए कि उनके पिछले कार्यकाल में बिहार में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया था और अपराधियों को सरकारी संरक्षण की घटनाओं के लिए सबूत जुटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह साफ़ परिलक्षित होता था। इस बार भी विधानसभा में 135 ऐसे सदस्य पहुंचे हैं, जिनका इतिहास किसी न किसी रूप में दागदार है। नीतीश जी किस तरह उनपर लगाम कसे रखेंगे और भ्रष्टाचार को कैसे रोकेंगे, इसपर सबकी नज़र रहने वाली है, क्योंकि अगर वे ऐसा नहीं कर पाए, तो जंगलराज पार्ट-2 के आरोप से वे अपनी और लालूजी की साझा सरकार को बचा नहीं सकेंगे।

आशा करते हैं कि नीतीश जी ने एक कदम बढ़ाया है तो दूसरा कदम भी बढ़ाएंगे, ताकि उनकी सरकार सही दिशा में चलती हुई दिखाई दे। उन्हें हमारी पूरी शुभकामनाएं हैं।

धंधा चौपट होने के डर से सफाई तो आई, लेकिन विनम्रता नदारद!

(25 नवंबर 2015)

जब आमिर को लगा कि ये वाला पब्लिसिटी स्टंट महंगा पड़ गया है और इससे तो धंधा ही चौपट हो जाएगा, तो दो दिन बाद उनकी सफाई आई। हालांकि उनकी इस सफाई में मुझे विनम्रता कम, हेकड़ी अधिक दिखाई दे रही है।

आमिर कहते कि उनकी बात को गलत समझा गया। आमिर भरते देशभक्ति का दम। कहते कि न उनकी पत्नी, न वे भारत छोड़ना चाहते हैं। लेकिन अगर उनमें ज़रा भी विनम्रता होती तो वे यह भी कहते कि "अगर उनकी बात से किसी को ठेस पहुंची है, तो इसके लिए वे माफी चाहते हैं (या कम से कम उन्हें खेद है।) उनका इरादा वैसा नहीं था, जैसा समझा गया।"

जब आपकी बात से बड़ी संख्या में लोगों को ठेस पहुंचे, तो विनम्र लोग इसी तरह अपनी बात रखते हैं, लेकिन आमिर ने ऐसा कुछ नहीं कहा। आमिर ने कहा "I stand by everything that I have said in my interview" यानी "मैं अपने इंटरव्यू में कही गई हर बात पर कायम हूं।" यानी पिछले 6-8 महीनों में ही देश में ऐसा माहौल बन गया, जिसकी वजह से उनकी पत्नी ने देश छोड़ कहीं और बस जाने की बात कही- इस बात पर वे कायम हैं।

आमिर ने यह भी कहा कि "To all the people shouting obscenities at me for speaking my heart out, it saddens me to say you are only proving my point" यानी "आप सभी लोग जो दिल की बात कहने के लिए मुझपर चिल्ला-चिल्ला कर अश्लील टिप्पणियां कर रहे हैं, मुझे उदास/दुखी करते हैं और मेरी बात को सही साबित कर रहे हैं।"

अश्लील टिप्पणियां करने वालों का तो कोई समर्थन नहीं कर सकता, लेकिन आमिर ने सोचा कि जिन लोगों ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया, अगर उन्होंने अप्रिय टिप्पणियां की, तो क्यों की? आमिर के दुख की परवाह सभी करें, लेकिन आमिर क्या उनकी परवाह न करें, जो आमिर के बयान से इस कदर दुखी हो गए कि आपा खो बैठे?

हम हर व्यक्ति से संयमित बयान की आशा करते हैं, लेकिन जिसने संयम खोया, हर वह व्यक्ति आमिर को ग़लत क्यों लगता है? आख़िर वह भी तो दुखी हुआ? उसके दिल को भी तो चोट पहुंची?

आमिर की बातों से यह भी लगा कि अश्लील टिप्पणियां करने वालों से तो वे दुखी हुए, लेकिन मर्यादित आलोचना करने वालों को भी अलग श्रेणी में रखकर नहीं देख रहे। अगर ऐसा है, तो क्या यही उनकी लोकतांत्रिक और सहिष्णुता भरी सोच है? इसी सोच के दम पर वे दूसरों की आलोचना कर रहे हैं?

किसी स्टार को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अगर उसकी फिल्मों को पसंद करते हैं, तो आंख मूंदकर उसकी हर बात का भी समर्थन करेंगे? अगर आमिर को इस देश से असहमत होने का अधिकार है, तो इस देश को आमिर से असहमत होने का अधिकार क्यों नहीं है? इस देश में हम प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों सबसे असहमत हो सकते हैं, आमिर से क्यों नहीं हो सकते?

आमिर की इस सफाई से ऐसा लगता है कि वे अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। अगर आप उनकी बात से सहमत हों, तब तो वे सही हैं ही, लेकिन अगर असहमत हुए, तो भी आप उन्हें ही सही साबित करेंगे। आमिर ख़ान होगे बड़े स्टार, लेकिन सिर्फ़ वही सही हैं और उनसे असहमत सारे लोग ग़लत? सिर्फ़ उन्होंने या उनके साथ खड़े लोगों ने ही सच्चाई का ठेका ले रखा है, बाकी सब झूठे हैं?

आमिर कहते हैं कि "To all those people who are calling me anti-national, I would like to say that I am proud to be Indian, and I do not need anyone's permission nor endorsement for that" यानी "जो लोग मुझे देश-विरोधी कह रहे हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि मैं भारतीय होने में गर्व महसूस करता हूं और इसके लिए मुझे किसी से इजाज़त लेने या पुष्टि करवाने की ज़रूरत नहीं है।"

बात ठीक है। अगर कोई उन्हें "देश-विरोधी" या "देशद्रोही" कहता है, तो ग़लत है। भारतीय होने में गर्व होना भी बहुत अच्छी बात है। लेकिन हम तो भारतीय होने में विनम्रता भी महसूस करते हैं। हमारे यहां कहा गया है- "विद्या ददाति विनयम्" यानी "ज्ञान हमें विनम्रता देता है।" लेकिन आमिर के पूरे जवाब मे विनम्रता का लेश-मात्र भी आप ढूंढ़ते रह जाएंगे।

एक तो आपने लोगों को चोट पहुंचाई। ऊपर से आप ही उन्हें क्रिटिसाइज़ भी कर रहे हैं, यह तो बहुत गलत बात है। हम उन लोगों का समर्थन नहीं करते, जिन्होंने आपको देशद्रोही कहा या गालियां दी, लेकिन आपने जिन लोगों को ठेस पहुंचाई, क्या आपको भी उनसे माफी नहीं मांगनी चाहिए थी या कम से कम खेद नहीं जताना चाहिए था?

आमिर ख़ान के किरण के देश छोड़ने के इरादे वाले बयान के बाद मैंने यह फ़ैसला नही किया था, क्योंकि तब तक मुझे उम्मीद थी कि आमिर अपने बयान को सुधार लेंगे, कलाकार हैं, भावनाओं में बह गए होंगे, लेकिन उनकी इस "अविनम्र सफ़ाई" के बाद मुझे उनसे कोई उम्मीद नहीं है। सो, मैं आगे से आमिर खान की कोई फिल्म नहीं देखूंगा।

Wednesday, November 25, 2015

‘पीके मोड’ से निकले नहीं और ‘दंगल मोड’ में घुस गए आमिर

पीके आए हैं का? दंगल काहे ठाने हैं?

(24 नवंबर 2015)

ऐसा लगता है कि आमिर ख़ान अभी ‘पीके मोड’ से निकले भी नहीं हैं और ‘दंगल मोड’ में घुस गए। ‘पीके मोड’ में होने की वजह से अभी तक उन्हें लग रहा है कि वे इस गोले के जीव ही नहीं हैं। अगर वे अपने को इसी गोले का जीव समझ रहे होते, तो उन्हें पता होता कि धरती पर हर जगह कुछ न कुछ समस्या है और तुलनात्मक रूप से भारत काफी बेहतर है। दूसरी तरफ, ‘दंगल मोड’ में घुस जाने की वजह से कांग्रेसी असहिष्णुता के चक्कर में फंसकर उन्होंने बिना बात दंगल छेड़ दिया है। 

बहरहाल, देश पर एहसान करने के लिए हम आमिर खान और किरण राव के शुक्रगुज़ार हैं। अगर वे देश छोड़कर चले गए होते, तो भारत पर विपत्तियों का पहाड़ टूट गया होता। हे आमिर खान साहब, आपने और आपकी पत्नी ने देश के 125 करोड़ लोगों को विपत्ति से बचा लिया, इसलिए ईश्वर करें, अगली फ़िल्म से आप 500 करोड़ की संपत्ति कमाएँ। कई लोग ऐसा कह भी रहे हैं कि सुर्खियों में बने रहने से आप लोगों की कमाई बढ़ जाती है और सुर्खियों से हट जाने से घट जाती है। 

वैसे आमिर ख़ान साहब, आप जो ऐसा बोल रहे हैं, उसके पीछे एक ख़ास किस्म की मानसिकता होती है। कई बेटे जब सक्षम हो जाते हैं, तो वे बात-बेबात माँ-बाप को घर छोड़ने की धमकी देने लगते हैं। आप दोनों को भी इस देश ने इतना सक्षम बना दिया है कि आप देश छोड़ने के बारे में सोच सकते हैं। हमें आपकी ऐसी सोच से दुःख तो हुआ, पर एतराज कोई नहीं, क्योंकि तसल्ली है कि भारत ने आपको इस लायक बना दिया है कि आप जहाँ भी जाएंगे, सुख और सम्मान से जी सकते हैं। 

लेकिन हे आमिर ख़ान साहब, कई बेटे ऐसे भी होते हैं, जो परिवार का हर दुःख साझा करते हैं, हर कष्ट सह लेते हैं, एक-दूसरे से कई तरह की असहमतियां और दिक्कतें होते हुए भी साथ खड़े रहते हैं। हमेशा घर को बेहतर बनाने के लिए सोचते और प्रयासरत् रहते हैं, लेकिन घर छोड़ने की बात कभी नहीं कहते। 

इसी देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो थानों से पिटकर और अदालतों से नाइंसाफी लेकर लौटते हैं, पर देश छोड़ने की धमकी नहीं देते। लाखों किसान क़र्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर लेते हैं, पर देश छोड़ने की धमकी नहीं देते। करोड़ों दलितों, महादलितों, पिछड़ों, अगड़ों और यहाँ तक कि अल्पसंख्यकों के भी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और मजबूरी में मज़दूरी करते हैं, फिर भी वे देश छोड़ने की धमकी नहीं देते। 

दिल्ली में 3000 सिखों का क़त्ल हुआ, फिर भी उन्होंने देश छोड़ने की धमकी नहीं दी। कश्मीर से साढ़े तीन लाख पंडितों को खदेड़ दिया गया, अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, फिर भी देश छोड़ने की धमकी नहीं दी। खुद मुसलमान भी गुजरात समेत कई दंगों में मारे गए, लेकिन उन्होंने देश छोड़ने की धमकी नहीं दी। जिस दादरी कांड पर इतनी राजनीति हो रही है, उसके मृतक अख़लाक़ के बेटे ने भी देश छोड़ने की धमकी देने के बजाय कहा- ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।‘ 

लेकिन हे आमिर ख़ान साहब, आप पर कभी ऐसी कोई विपत्ति नहीं आई, फिर भी आप देश छोड़ने की बात कह सकते हैं, क्योंकि आप मिस्टर परफैक्शनिस्ट हैं। आपको परफैक्ट देश चाहिए। अगर इस गोले पर वह परफैक्ट देश नहीं मिला, तो आप दूसरे गोले पर चले जाएंगे। 

अगर आप मिस्टर परफैक्शनिस्ट नहीं होते, तो किरण को समझाते कि आपके पास दौलत है, शोहरत है, लोगों का प्यार है, प्रभावशाली लोगों तक पहुँच है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से आप जब चाहें, मिल सकते हैं। आपके साथ कोई नाइंसाफी होने की सम्भावना इस देश में न के बराबर है। आपने दो बार शादी की। दोनों बार अलग धर्म में की, फिर भी किसी ने एतराज नहीं किया, बल्कि आपका साथ ही दिया। आपने देश का दिल तोड़ने वाला बयान दिया, फिर भी आपके घर की सुरक्षा कड़ी कर दी गयी।

आपके समझाने पर भी किरण अगर नहीं समझतीं, तो किसी अच्छे मनोचिकित्सक से उनकी काउन्सिलिंग कराते। कई बार समाज से कट जाने और देश-काल-परिस्थितियों की समझ के लिए अखबार, टीवी और फिल्मों पर अधिक निर्भर हो जाने से भी मन में डर, अवसाद और असुरक्षा की भावना आ जाती है। अगर आपने कांग्रेस के फंदे में फंसकर राजनीतिक बयान नहीं दिया है और सच कहा है, तो ऐसा सिर्फ़ किरण के साथ नहीं हुआ है। बहुतों के साथ होता है। आपको पत्नी का इलाज कराना था। 

लेकिन आपने तो पत्नी का इलाज कराने की बजाय देश पर ही इल्ज़ाम मढ़ दिया! वाह आमिर वाह। 

मिस्टर परफैक्शनिस्ट की अदा निराली। 
खा-पी लो, फिर छेदो थाली।

कांग्रेस खेल रही गंदा खेल। बीजेपी का भी लगता मेल।

असहिष्णुता का हौवा खड़ा कर बांटने वाली राजनीति
(25 नवंबर 2015)
कांग्रेस पार्टी जिन्ना जैसी सेक्युलर पॉलिटिक्स कर रही है। अगर 10-15 साल वह सत्ता से बाहर रह गई, तो दोबारा देश का बंटवारा करा देगी। इस पार्टी ने पहले नेहरू को पीएम बनवाने के लिए देश का बंटवारा कराया। इस बार वह मोदी को पीएम पद से हटाने के नाम पर देश को बांट देगी।
दादरी कांड से पहले भी देश में कई दंगे हुए, लेकिन हिन्दुओं-मुसलमानों का ऐसा वैचारिक बंटवारा हमने नहीं देखा। पिछले डेढ़ महीने में कांग्रेस और सहयोगी दलों ने पेड, पूर्वाग्रही और ऑब्लाइज्ड बुद्धिजीवियों के सहारे असहिष्णुता का जैसा हौवा खड़ा किया है, उससे साफ़ है कि अंग्रेज़ों के असली मानसपुत्र, जिनका 'फूट डालो और राज करो' ही ध्येय है, कहीं नहीं गए हैं।
सत्ता के बिना कांग्रेस की जान बिना पानी की मछली की तरह तड़पने लगती है। यह वही पार्टी है, जिसकी नेता के चुनाव पर इलाहाबाद हाई कोर्ट से प्रश्नचिह्न लगा, तो देश में इमरजेंसी लगा दी; जिसकी नेता की हत्या हुई, तो तीन दिन के भीतर दिल्ली में सिखों की समूची पीढ़ी को तबाह कर दिया; जिसके दबंग नेता दलितों-पिछड़ों को बूथ तक पहुंचने ही नहीं देते थे और दशकों तक बूथ-कब्जे के सहारे इस देश में चुनाव जीतते रहे।
आज वही कांग्रेस देश को सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रही है और असहिष्णुता का हौवा खड़ा कर रही है। विश्वस्त सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक कांग्रेस और सहयोगी दलों ने बिहार-चुनाव में असहिष्णुता की बहस का परीक्षण-मात्र किया था। चूंकि यह परीक्षण कामयाब रहा है, इसलिए उनके हौसले और बुलंद हो गए हैं और अब वे इस प्रयोग को और लंबा खींचना चाहते हैं।
सच्चाई यह है कि असहिष्णुता की पूरी बहस देश से असहिष्णुता को ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि उसे और हवा देने के लिए है। लोगों के मन से डर निकालने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें और डराने के लिए है। कांग्रेस और उसके साथी दल कभी नहीं चाहते कि मुस्लिम इस देश में निडर होकर रहें। अगर उनके मन से डर निकल गया, तो इनकी सियासत ही समाप्त हो जाएगी।
बीजेपी के नीति-निर्माता भी या तो इतने नासमझ हैं कि कांग्रेस की इस विध्वंसकारी राजनीति को समझ नहीं पा रहे, या फिर इतने महीन, कि वे भी क्रिया और प्रतिक्रिया के खेल में अपना फ़ायदा देख रहे हैं। उन्हें भी लगता होगा कि मुसलमानों का ध्रुवीकरण अंततः हिन्दुओँ के ध्रुवीकरण में तब्दील होगा। इसीलिए उन्होंने अपने सभी औने-पौने-बौने नेताओं को खुला छोड़ रखा है। वे न उनपर लगाम कसते हैं, न उनपर कार्रवाई करते हैं। उल्टे मौका देखकर उन्हें पुरस्कृत भी कर देते हैं।
यह गंदा... बेहद गंदा खेल है।

Thursday, November 19, 2015

एक डकैत और एक बलात्कारी- दो विकल्प हों, तो किसे वोट देंगे आप?

सही उम्मीदवार की मांग है 'नोटा'
(1 अक्टूबर 2015)

कहा जाता है "यथा राजा तथा प्रजा।" जितना सही यह है, उतना ही सही यह भी है कि "यथा प्रजा तथा राजा।" राजा की दुश्चरित्रता प्रजा को भी चरित्र-भ्रष्ट करती है और दुश्चरित्र प्रजा को भी सद्चरित्र राजा की ज़रूरत महसूस नहीं होती है।

हमारे देश और राज्य में आज जिस जातिवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, वह भी इसीलिए है कि एक तरफ जहां जातिवादी, सांप्रदायिक और भ्रष्ट नेता तरह-तरह के हथकंडों से लोगों में एक-दूसरे के लिए विरोध भरते हैं और उन्हें असली मुद्दों से भटकाते हैं, वहीं जातिवादी, सांप्रदायिक और भ्रष्ट नागरिक भी उन्हीं लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं, जो उन्हीं की तरह बंद सोच का शिकार हो।

बहरहाल, लोकतंत्र हमें यह अधिकार देता है कि हम किसी भी पार्टी या उम्मीदवार का समर्थन करें और उसे वोट दें। लेकिन आम तौर पर हम देखते हैं कि चुनाव में हमारे पास बड़े सीमित विकल्प होते हैं। अक्सर हमारे सामने हमारे मन का उम्मीदवार नहीं होता और मजबूरन हमें उन्ही में से किसी एक को चुनना पड़ता है, जिन्हें मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया होता है। यानी हम किसी वंश के कीड़े-मकोड़े या फिर किसी धनबली, बाहुबली, जातिवादी, सांप्रदायिक या भ्रष्ट को वोट दे आते हैं।

जिस तरह मौजूदा व्यवस्था हमें सीमित विकल्प देती है, उसी तरह हमारे पास इस व्यवस्था में बदलाव लाने के विकल्प भी सीमित हैं। ऐसा कोई रामबाण नहीं है, जिससे एक झटके में जातिवाद और सांप्रदायकता खत्म हो जाएगी और राजनीतिक दल सकारात्मक राजनीति करने लगें और साफ-सुथरे लोगों को टिकट देने लगें। इसलिए बदलाव चाहने वाली ताकतो को अक्सर विकल्पों में से विकल्प निकालने की योजना पर काम करना होता है।

नोटा भी ऐसी ही सीमित शक्ति वाला एक विकल्प है, लेकिन बड़ी संख्या में इसके इस्तेमाल से कई और विकल्पों के रास्ते खुल सकते हैं। मैंने नोटा को कभी ब्रह्मास्त्र नही बताया। नोटा एक नयी चीज़ है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनावों में लागू की गई है। ठीक है कि कई लोगों को लगता हो कि नोटा डालने से क्या होगा? कोई न कोई तो फिर भी जीतेगा। वोट बर्बाद हो जाएगा। वगैरह-वगैरह।

मेरे हिसाब से यह सोच सही नहीं है। वास्तव में कोई वोट बर्बाद नहीं होता। अगर वोट बर्बाद होने का कॉन्सेप्ट सही होता, तो हमारे संविधान-निर्माताओं को भारत में द्विदलीय व्यवस्था लागू करनी चाहिए थी, क्योंकि किसी भी चुनाव में कोई एक ही जीतता है और कोई एक ही मुख्य मुकाबले में होता है और दूसरे नंबर पर रहता है। तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे और बाद के सारे उम्मीदवारों को दिये वोट इस सोच के मुताबिक बर्बाद हो जाते हैं।

इसलिए जैसे तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे और बाद के सारे उम्मीदवारों को दिये वोट का अपना महत्व है, उसी तरह नोटा में दिये गए वोट की भी अपनी सार्थकता है। नोटा वोट से दो फायदे होते हैं। एक यह- कि यह मन के ख़िलाफ़ जाकर किसी को वोट देने की आपकी मजबूरी खत्म कर देता है। दूसरा यह- कि आपको आत्मसंतोष रहता है कि चाहे जिसने जिसका समर्थन किया हो, कम से कम आपने किसी गलत का समर्थन नहीं किया... किसी गलत को गद्दी तक पहुंचाने में कम से कम आपका रोल नहीं है।

और अच्छे से समझिए। अगर किसी चौक-चौराहे पर दो बदमाश झगड़ा कर रहे हों, तो आप उनमें से किसी एक का साथ तो नहीं दे देते? अक्सर गैंगवार होते रहते हैं। आप किसी एक गैंग के पक्ष में झंडा लेकर खड़े तो नहीं हो जाते? वहां आप कहते हैं कि दोनों बदमाश हैं और दोनो गलत है। लेकिन जैसे ही आप चुनाव में जाते हैं, आप कहने लगते हैं कि दोनों बदमाश हैं, फिर भी एक का साथ तो मुझे देना ही पड़ेगा। नोटा... अंतरात्मा के विरुद्ध जाने की आपकी इस मजबूरी को तो कम से कम ख़त्म कर ही देता है!

नोटा में और मतदान नहीं करने में अंतर है। अगर आप मौजूदा व्यवस्था, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों से चिढ़कर वोट नही डालते हैं, तो वह कही दर्ज नही होता। यह नही माना जाता कि आप नाराज़ हैं, इसलिए वोट नहीं डाला। लेकिन जब आप नोटा में वोट डालेंगे, तो यह दर्ज होगा कि आप नाराज़ हैं। आपके सामने उम्मीदवारों के जितने विकल्प दिये गए, वे आपकी आकांक्षाओं के हिसाब से नहीं थे।

मेरे पिछले वक्तव्य को कुछ साथियों ने ठीक से पढ़ा नहीं। आखिरी पैराग्राफ में मैने साफ़ लिखा- "उम्मीदवार देखो और वोट दो। जहां जो उम्मीदवार अच्छा है उसे जिता दो। बाकी किसी के बेेटे-पोते-भाई-भतीजे-नाती-दामाद-बहू-पतोहू की परवाह मत करो। जहां कोई अच्छा न लगे, डाल दो सारा वोट "नोटा" पर।"

कुछ साथियों ने इसे नेगेटिव सोच और फ्रस्ट्रेशन का नतीजा बताया। अब अगर इससे भी किसी की असहमति है, तो मैं उन लोगो को यही सलाह दूंगा कि आप लोग "अपमाननीय" को "माननीय" बनाते रहें। उदाहरण के लिए, अगर बलात्कारी और डकैत दो विकल्प हों, तो इनमें से जो डकैतों के पराक्रम के मुरीद हैं, वे डकैत को वोट दें और जिन्हें बलात्कारियों के बलात्कार की कथाएं रोमांचक लगती हैं, वे बलात्कारी को वोट दें।

व्यक्तिगत मेरी सोच यही है कि मेरा वोट किसी भी ग़लत के पक्ष में नहीं जाना चाहिए। अगर मेरे वोट के बिना भी जीत-हार का फ़ैसला हो रहा है तो हो जाने दीजिए, सरकार बन रही है तो बन जाने दीजिए। इस देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जिसमें हमारी-आपकी कोई भूमिका नहीं है। इसलिए कम से कम मेरी अतरात्मा मुझे धिक्कारेगी तो नहीं कि मैंने भी उसे ही वोट दे दिया, जिसे मैं पसंद नहीं करता था... कि मैंने भी किसी को वंश बढ़ाने के लिए, किसी को धनबल-बाहुबल बढ़ाने के लिए, किसी को अगड़ा-पिछड़ा करने के लिए, किसी को हिन्दू-मुसलमान करने के लिए अपनी रज़ामंदी दे दी। मेरे वोट की सबसे बड़ी सार्थकता मेरे विचारों की रक्षा में है, न कि किसी "अपमाननीय" को "माननीय" बना देने में।

बाकी मैं मानता हूं कि अभी हमारे बंधु-बांधव नोटा को इसलिए फिजूल मान रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इसका उस पैमाने पर इस्तेमाल ही नहीं किया है। ज़रा सोचिए अगर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी भी उम्मीदवार से ज़्यादा वोट नोटा को मिले, तो राजनीतिक दलों के कान तो खड़े हो जाएंगे, उनकी बेइज्जती तो होगी, आगे लड़ाई लड़ने का एक आधार तो बनेगा। दोबारा चुनाव का रास्ता तो खुलेगा। राजनीतिक दलों को यह तो समझ में आएगा कि डकैतों और बलात्कारियों जैसा विकल्प देने को जनता अब बर्दाश्त नहीं करेगी।

...और अगर एक से अधिक क्षेत्रों में ऐसा हो जाए, तो सोचिए कितना असर हो सकता है। मेरा कहना है कि नोटा को हल्के में लेने के बजाय एक बार इसका पुरज़ोर इस्तेमाल क्यों नहीं करते हैं हम? फिर करते रहेंगे इसकी ताकत की समीक्षा। नोटा को एक "नेगेटिव वोट" के रूप में नहीं, एक "उम्मीदवार" के रूप में देखिए। फिर आपको समझ आएगा कि नोटा क्या चीज़ है।

जैसे आपके इलाके में अगर 10 उम्मीदवार हैं तो यह मत समझिए कि आपके सामने 10 ही विकल्प हैं। आप यह समझिए कि आपके सामने 11 उम्मीदवार... 11 विकल्प हैं। अगर आपका 11वां विकल्प... 11वां उम्मीदवार... यानी नोटा... बाकी 10 उम्मीदवारों और 10 विकल्पों से अधिक वोट ले आएगा, तो मैं आपको गारंटी देता हूं कि उसी दिन से क्रांति और बदलाव की शुरुआत हो जाएगी।

दिल्ली के लोगों ने मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ एक और राजनीतिक पार्टी... आम आदमी पार्टी खड़ी की। क्या फ़ायदा हुआ? 100 भ्रष्ट पार्टियों के बाद 101वीं भ्रष्ट पार्टी खड़ी हो गई। इसलिए समाधान यह भी नहीं है कि हम रोज़-रोज़ नई-नई पार्टियां खड़ी करते चलें। समाधान यह है कि इन्हीं पार्टियों को ज़िम्मेदार बनाने की कोशिश करे।

सारे झूठे-मक्कारों, ढोंगी-फरेबियों, चोर-उचक्कों, जातिवादियों-सांप्रदायिकों, भ्रष्ट-लुटेरों पर आप भरोसा करते हैं, एक बार मुझपर भी तो भरोसा करके देखें।