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Monday, June 20, 2016

राहुल बाबा फिर विदेश चले गए हैं (कविता)















राहुल बाबा फिर विदेश चले गए हैं
किस देश गए हैं, बताकर नहीं गए, वरना ज़रूर बताता
उनकी ग़ैर-मौजूदगी में बड़ी अकेली पड़ जाती हैं उनकी माता!

कितने दिन के लिए गए हैं, यह भी तो उन्होंने बताया नहीं
क्या करने गए हैं, इस बारे में भी कुछ जताया नहीं
जून की इन सुलगती गर्मियों में पार्टी के लोग हो गए बिना छाता!

मुझे चिंता हो रही है कांग्रेस की, जिसे सर्जरी की ज़रूरत है
और सर्जरी की डेट टलती ही जा रही है
130 साल पुरानी काया अब गलती ही जा रही है
पर जो सर्जन है, वही फिर रहा है क्यों छिपता-छिपाता?

राहुल बाबा का जी अगर है ज़िम्मेदारी से घबराता
तो प्रियंका बेबी को ही हम बुला लेते
उनके मैजिक की माया में साल दो साल तो ख़ुद को भुला लेते
पर इस अनिश्चय की स्थिति में तो हमें कुछ भी नहीं है बुझाता!

दिग्गी से पिग्गी से, मणि से शनि से भी तो काम नहीं चलता
क्या करें, कांग्रेस में गांधी-नेहरू के सिवा कोई नाम नहीं चलता
ये कैसे कठिन समय में हमें डाल दिया, हे दाता!

पहले वाले दिन कितने अच्छे थे।
एक मम्मी थी और हम ढेर सारे बच्चे थे।
न कोई बही थी, न था कोई खाता।
जो जी में आता, वही था खा जाता।

(20 जून 2016)

Wednesday, March 16, 2016

राहुल की राष्ट्रघाती राजनीति की क्षय हो!

खिलाड़ी अगर अंपायर के फ़ैसले पर असंतुष्टि ज़ाहिर कर दे, तो उसे सज़ा हो जाती है। विराट कोहली पर मैच फीस का तीस फीसदी जुर्माना लगा दिया गया है। लेकिन देश का नागरिक अगर सबसे बड़े अंपायर यानी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को "न्यायिक हत्या" कहे, तो वह क्रांतिकारी कहलाता है!

राहुल की राष्ट्रघाती राजनीति की क्षय हो!
(28 फरवरी 2016)